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Navagraha Stotram Lyrics in Hindi and English

navagraha Stotram

The Nava grah Devta (deities) or 9 planets are sacred in Hinduism, they create both auspiciousness (shubha) and calamity (ashubha). 9 planets are namely Surya, Budha, Shukra, Mangal, Chandra, Brihaspati, Shani, Rahu and Ketu.

Written by well known Hindu Sage Shri Vedavyasa, Sri Navagraha Stotra consists 9 verses (Shlokas) for woshiping for 9 planets. This Stotra Patha is done to placate (calm) the ill effects of the Planets in our Janma Kundli. 

Also, it can be recited when someone feels bad dreams in nights. Navagraha or planets give prosperity and betterment of mind and soul.

When to recite this Stotra? You can recite Navagraha Stotram in morning while pouring water to Sun or while sitting before idols after taking bath. You can also do this Patha in evening after taking a bath. Man, woman or child anyone should do this Patha as per the wish.

Here Hindi and (after that) English lyrics are given, be sure to subscribe our blog- here.

नवग्रह स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित-

।अथ व्यासरचितं नवग्रह स्तोत्रम्।

जपाकुसुम सङ्काशं काश्यपेयम् महदद्युतिम्।
तमोरिंसर्वपापघ्नम् प्रणतोऽस्मि दिवाकरं।1।

  japaakusuma sankasham kaashyapeyam mahaadadyutim.
Tamorim-sarvaPaapaghnam pranatosmi divaakaram.1

कुसुम के फूल जिन्हें प्रिय हैं, जो कश्यपेय ( ऋषि कश्यप के पुत्र ) हैं, जिनकी महान चमक है, जो अन्धकार के शत्रु हैं और सभी पापों का नाश करते हैं, उन दिवाकर ( सूर्य ) को मैं प्रणाम करता हूँ।

दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवं।
नमामि शशिनम् सोमं शंभोर्मुकुट भूषणं।2।

 daadhashamkha tushaaraabham ksheero daarnava sambhavam.
namaami shashinam somam shambhormukuta bhooshanam.2

 जिनका रंग दही और हिम ( बर्फ ) के समान हैं, समुद्रसे जिनका उद्भव ( जन्म ) हुआ है, शशि को, शिव के मुकुट के आभूषण सोम (चन्द्र) देव को मैं नमस्कार करता हूँ।

धरणीगर्भ संभूतम् विद्युत्कान्ति समत्प्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलम् प्रणाम्यहम्।3।

Dharani garbha sambhootam vidyut kaanti samatprabham.
kumaaram shaktihastam tam mangalam pranaamyaham.3

  जो भूमा देवी ( पृथ्वी ) के गर्भ से जन्मे हैं, बिजली की चमक के जैसी जिनकी प्रभा ( दमक ) है, हाथ में शक्ति धारण करने वाले मंगल (अंगारक) आपको प्रणाम करता हूँ।

प्रियंगुकलिकाश्यामम् रूपेणाप्रतिमं बुधं।
सौम्यं सौम्य-गुणोपेतं तं बुधम् प्रणमाम्यहम्।4।

Priyamgu  kalikaa shyaamam roopena apratimam budham.
Saumyam Saumya Gunopetam Tam Budham Pranamaamyaham.4

 प्रियंगु पुष्प की कली के समान श्याम (सांवले), अद्वितीय रूप वाले, चन्द्रमा के पुत्र, सौम्य गुणों वाले हे बुध मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशम् तं नमामि बृहस्पतिं।5। 

Devaanaamcha Risheenaamcha Gurum Kaamchana Sannibham.
Buddhibhootam trilokesham tam namaami Brihaspatim.5

 देवों के गुरू और ऋषियों के गुरू, ताप को बिखेरने वाले, बुद्धिमान और तीनों लोकों में ईश्वर हे ब्रहस्पति! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानाम् परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवम् प्रणमाम्यहम्।6। 

Himakunda mrinalaabham Daityaanaam paramam gurum.
SarvaShaastra Pravaktaaram Bhaargavam Pranamaamyaham.6

 ओस की बूदों, कमल के तने और थुम्ब के फूल के समान जिनकी आभा (चमक) है, दैत्यों के परम गुरू, सभी शास्त्रों के प्रवक्ता (वाचक) हे शुक्र ( शुक्राचार्य ), मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

नीलांजन समाभासम् रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तन्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्।7।

Neelaamjana samaabhaasam Raviputram Yamaagrajam.
Chhaaya Maartanda Sambhutam tam namaami shanaishcharam.7

 नीले वर्ण वाले, कोयले जैसे, सूर्य के पुत्र और यम के भाई, सूर्य और छाया के यहाँ जन्मे शनिश्चर (शनीश्वर) आपको प्रणाम करता हूँ।

अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।8।

Ardhakaayam mahaaveryam chandraaditya vimardanam.
Simhika Garbha Sambhootam tam raahum pranamaamyaham.8

जिनका शरीर आधा है, महावीर, चन्द्र और सूर्य का मर्दन ( ग्रहण ) करने वाले, सिंहिका (शेरनी) के गर्भ से उत्पन्न हे राहु! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रह मस्तकं।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुम् प्रणमाम्यहम्।9।

Palaasha pushpa samkaasham taarakaagrah mastakam.
Raudram raudraatmakam Ghoram tam ketum pranamaamyaham.9

 पलाश (छेवले) का फूल जिन्हें प्रिय है, जो तारों के सम्राट हैं, डरावने एवं रौद्र रूप वाले हे घोर और क्रोधी केतु! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

इति श्री व्यासमुखोग्दीतं यः पठेत् सुसमाहितः।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति।10।

Iti shri vyaasa mukhogdeetam yah pathet susamaahitah.
Divaa vaa yadi vaa ratrau vighna shaantir-bhavishyati.10

यह स्तोत्र व्यास ऋषि के द्वारा रचित है, जो भी नर नारी इस का सच्चे मन से दिन या रात में पाठ करेगा, उसकी सभी बाधायें शांत हो जायेंगी।

नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनं।
ऐश्वर्यमतुलम् तेषाम् आरोग्यम् पुष्टिवर्धनं।11।

Naranaari nripaanaamcha bhavet duhswapna naashanam.
Aishwaryamatulam teshaam aarogyam pushtivardhanam.11

इस पाठ को करने से नर, नारी या नृप (राजा) सभी के बुरे स्वप्न नाश होते हैं, उसे अतुल्य ऐश्वर्य, आरोग्य और धन की वृद्धि होती है।

ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः।
ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः।12।

Graha nakshatrajaah peedas-taskaraagni-samudbhavah.
taa sarvaah-prashamam yaanti vyaasobrute na samshayah.12

इस स्तोत्र से गृह, राशि और नक्षत्रों की पीड़ा से मुक्ति होती मिलती है यह व्यास ऋषि का कथन है इसमें कोई संशय नहीं है।

।इति श्री व्यास विरचितं आदित्यादि नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णम्। 

इस प्रकार व्यास मुनि द्वारा रचित नवग्रह स्तोत्र पूरा हुआ।ॐ।

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